श्री गौर-आरती: चैतन्य महाप्रभु की दिव्य संध्या आरती (पूर्ण विधि और अर्थ सहित)

इस्कॉन (ISKCON) मंदिरों में हर शाम एक गूंज सुनाई देती है जो मन को शांत और आत्मा को आनंदित कर देती है। यह गूंज है ‘गौर आरती’ की। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा रचित यह आरती भगवान चैतन्य महाप्रभु की दिव्य सुंदरता का वर्णन करती है। यदि आप अपने जीवन में शांति, पवित्रता और कृष्ण-प्रेम चाहते हैं, तो इस आरती को समझना और गाना आपके लिए अनिवार्य है।

॥ श्री गौर-आरती ॥

जय जय गोराचाँदेर आरति को शोभा । 

जाह्नवी-तटवने जगमन-लोभा ॥१॥

 

दक्षिणे निताइ चाँद, बामे गदाधर । 

निकटे अद्वैत श्रीनिवास छत्रधर ॥२॥

 

बसियाछे गोराचाँद रत्नसिंहासने । 

आरति करेन ब्रह्मा-आदि देवगणे ॥३॥

 

नरहरि आदि करि’ चामर ढुलाय । 

सञ्जय मुकुन्द-वासुघोष-आदि गाय ॥४॥

 

शंख बाजे घण्टा बाजे, बाजे करताल । 

मधुर मृदंग बाजे, परम रसाल ॥५॥

 

बहु कोटि चन्द्र जिनि’ वदन उज्ज्वल । 

गलदेशे वनमाला करे झलमल ॥६॥

 

शिव- शुक -नारद प्रेमे गदगद । 

भकतिविनोद देखे गोरार सम्पद ॥७॥

१. श्री चैतन्य महाप्रभु की सुन्दर आरती की जय हो, जय हो। यह गौर-आरती गंगा तट पर स्थित एक कुंज में हो रही है तथा संसार के समस्त जीवों को आकर्षित कर रही है।

 

२. उनके दाहिनी ओर नित्यानन्द प्रभु हैं तथा बायीं ओर श्री गदाधर हैं। चैतन्य महाप्रभु के दोनों ओर श्री अद्वैत प्रभु तथा श्रीनिवास प्रभु उनके मस्तक के ऊपर छत्र लिए हुए खड़े हैं।

 

३. श्री चैतन्य महाप्रभु सोने के सिंहासन पर विराजमान हैं तथा ब्रह्माजी उनकी आरती कर रहे हैं, अन्य देवतागण भी उपस्थित हैं।

 

४. श्री चैतन्य महाप्रभु के अन्य पार्षद, जैसे नरहरि आदि, चामर डुला रहे हैं तथा मुकुन्द एवं वासुघोष, जो कुशल गायक हैं, कीर्तन कर रहे हैं।

 

५. शंख, करताल, तथा मृदंग की मधुर ध्वनि सुनने में अत्यंत प्रिय लग रही है।

 

६. श्री चैतन्य महाप्रभु का मुखमण्डल करोड़ों चन्द्रमा की भांति उद्भासित होकर चमक रहा है तथा उनकी वनकुसुमों की माला भी चमक रही है।

 

७. शिवजी, श्री शुकदेव गोस्वामी तथा नारद मुनि के कण्ठ प्रेममय दिव्य आवेग से अवरुद्ध हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर चैतन्य महाप्रभु का वैभव देख रहे हैं!

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