HARE KRISHNA

Krishna: The Ultimate Source of Infinite Bliss and Inner Peace

Discover the Path of Devotion (Bhakti) to Find Everlasting Happiness

In today’s fast-paced world, everyone is searching for one thing: True Happiness. We see the whole world running—restlessly chasing money, complex relationships, and material success. But can these temporary gains ever satisfy the soul?

The ancient wisdom of the Bhakti Path teaches us that complete, eternal, and unchanging bliss cannot be found in the outside world. It exists only in Lord Krishna—the divine source who fills the heart with love and completes the soul.

He is the joy that gods, sages, and seekers have spent lifetimes searching for. Whether you are starting your spiritual journey or looking for deeper connection, find your way back to the source of all bliss.

शाश्वत सुख की खोज: भक्ति के मार्ग पर चलें

आज की इस भागदौड़ भरी दुनिया में, हर कोई सिर्फ एक ही चीज़ की तलाश में है: सच्ची खुशी। हम देखते हैं कि पूरी दुनिया—पैसों, जटिल रिश्तों और भौतिक सफलता के पीछे बेचैनी से भाग रही है। लेकिन क्या ये अस्थायी उपलब्धियां कभी हमारी आत्मा को संतुष्ट कर सकती हैं?

भक्ति मार्ग का प्राचीन ज्ञान हमें सिखाता है कि पूर्ण, शाश्वत और कभी न बदलने वाला आनंद बाहरी दुनिया में नहीं मिल सकता। यह केवल भगवान श्री कृष्ण में वास करता है—वह दिव्य स्रोत जो हृदय को प्रेम से भर देता है और आत्मा को पूर्णता प्रदान करता है।

वे वह आनंद हैं जिसे खोजने के लिए देवताओं, ऋषियों और साधकों ने अपना पूरा जीवन बिता दिया। चाहे आप अपनी आध्यात्मिक यात्रा अभी शुरू कर रहे हों या परमात्मा से गहरे जुड़ाव की तलाश में हों, आइए उस ‘परम आनंद’ के स्रोत की ओर वापस चलें।

भगवद गीता – श्लोक 1.16: धर्म के योद्धाओं का शंखनाद

भगवद गीता – अध्याय 1, श्लोक 16 श्लोक 1.16॥  अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।  नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥   अनुवाद:राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया, और उनके भाई नकुल तथा सहदेव ने क्रमशः सुघोष तथा मणिपुष्पक नामक शंखों का नाद किया। शब्दार्थ (Shabdarth):अनन्तविजयम् – अनन्तविजय नामक शंखराजा कुन्तीपुत्रः युधिष्ठिरः – कुन्तीपुत्र

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भगवद गीता: अध्याय 1, श्लोक 22 – शत्रु कौन है? अर्जुन की युद्धपूर्व दृष्टि

भगवद गीता: अध्याय 1, श्लोक 22 – शत्रु कौन है? अर्जुन की युद्धपूर्व दृष्टि   श्लोक : यावत्स्येतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् | कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ 1.22 शब्दार्थ :यावत् – जब तक एतान् निरीक्षे अहम् – मैं इनको देख न लूं योद्धुकामान् अवस्थितान् – जो युद्ध की इच्छा से खड़े हैं

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करके इशारो बुलाय गई रे,

करके इशारो बुलाय गई रे, ( indresh upadhyay )   करके इशारो बुलाय गई रे, करके इशारो बुलाय गई रे,  बरसाने की छोरी,  राधा गोरी गोरी,  बरसाने की छोरी, राधा गोरी गोरी….. करके इशारो बुलाय गई रे, करके इशारो बुलाय गई रे,  बरसाने की छोरी,  राधा गोरी गोरी,  बरसाने की

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अर्जुन का रथ रोकने का अनुरोध – भगवद गीता श्लोक 1.21 का रहस्य

अर्जुन का रथ रोकने का अनुरोध – भगवद गीता श्लोक 1.21 का रहस्य श्लोक (Sanskrit) अर्जुन उवाच | सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥1.21॥   शब्दार्थ अर्जुन उवाच – अर्जुन ने कहा  सेनयोः उभयोः मध्ये – दोनों सेनाओं के मध्य  रथं स्थापय – मेरा रथ स्थापित कीजिए  मे अच्युत – हे

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भगवद गीता: अध्याय 1, श्लोक 20 – “धर्म की घोषणा: अर्जुन का संकल्प” ​

भगवद गीता: अध्याय 1, श्लोक 20 – “धर्म की घोषणा: अर्जुन का संकल्प” श्लोक : अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः | प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः || हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते: |||   शब्दार्थ (Word Meaning): अथ – इसके बाद व्यवस्थितान् – व्यूह में सुसज्जित दृष्ट्वा – देखकर धार्तराष्ट्रान् – धृतराष्ट्र

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भाव: “वृन्दावन का मधुर मिलन”

भाव: “वृन्दावन का मधुर मिलन” वृन्दावन की छाया में, श्याम संग खेले बाल, कमल-पुष्प भी मुस्काएं, देखे यह रसमय हाल।कंचन जैसी धूप बिखरी, वृक्षों में मंजर लगे, प्रेम-रस की थाली लेकर, सखा संग मोहन जगे।ना है कोई भेद-भाव, ना रंक-धनी की बात, सखा बना है ईश्वर मेरा, बांट रहा है प्रीत-संतात। भोजन नहीं, यह प्रेम का अर्पण है मधुर

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