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Gita Wisdom

सम्बन्धों का मोह और जीवन का कड़वा सच: भगवद्गीता (1.34)

सम्बन्धों का मोह और जीवन का कड़वा सच: भगवद्गीता (1.34) अक्सर हम अपनी सफलता और खुशियों को अपनों के साथ साझा करना चाहते हैं। लेकिन क्या होगा अगर वही अपने हमारे सामने एक ऐसी स्थिति में खड़े हों जहाँ हमें उनके विरुद्ध निर्णय लेना पड़े? कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन भी इसी दुविधा से गुजर […]

Bhajan

हरि… हम कब मिलेंगे? (एक विरह पूर्ण पुकार)

हरि… हम कब मिलेंगे? (एक विरह पूर्ण पुकार) भक्ति मार्ग में भगवान से मिलन की तड़प ही भक्त की सबसे बड़ी पूंजी है। जब हृदय से सांसारिक मोह छूटने लगता है, तब केवल एक ही प्रश्न शेष रह जाता है— “प्रभु, आप कब मिलेंगे?” नीचे दी गई पंक्तियाँ उसी निस्वार्थ प्रेम और व्याकुलता को दर्शाती

Aarti

श्री गौर-आरती: चैतन्य महाप्रभु की दिव्य संध्या आरती (पूर्ण विधि और अर्थ सहित)

श्री गौर-आरती: चैतन्य महाप्रभु की दिव्य संध्या आरती (पूर्ण विधि और अर्थ सहित) इस्कॉन (ISKCON) मंदिरों में हर शाम एक गूंज सुनाई देती है जो मन को शांत और आत्मा को आनंदित कर देती है। यह गूंज है ‘गौर आरती’ की। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा रचित यह आरती भगवान चैतन्य महाप्रभु की दिव्य सुंदरता का

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अपनों के विरुद्ध युद्ध? अर्जुन का मोह और गीता का मर्म (अध्याय 1, श्लोक 33)

अपनों के विरुद्ध युद्ध? अर्जुन का मोह और गीता का मर्म (अध्याय 1, श्लोक 33) प्रस्तावना: भगवद गीता के पहले अध्याय “अर्जुन विषाद योग” में हम अर्जुन के मन के द्वंद्व को देखते हैं। श्लोक 33 उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ अर्जुन कृष्ण से अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बताते हैं कि जिन लोगों

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भगवद गीता – अध्याय 1, श्लोक 32, अर्जुन का त्याग भाव – इच्छाओं का अंत

भगवद गीता – अध्याय 1, श्लोक 32, अर्जुन का त्याग भाव – इच्छाओं का अंत श्लोक: किम् नो राज्येन गोविन्द किम् भोगैर्जीवितेन वा |  येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ॥ 32॥ शब्दार्थ (Shabdarth): किम् नः – हमें क्या लाभ राज्येन – राज्य से गोविन्द – हे गोविन्द (कृष्ण) किम् भोगैः – क्या सुख-सामग्री

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भगवद गीता – अध्याय 1, श्लोक 31, अर्जुन का मोह – धर्म का भ्रम और कर्तव्य से पलायन

भगवद गीता – अध्याय 1, श्लोक 31, अर्जुन का मोह – धर्म का भ्रम और कर्तव्य से पलायन संस्कृत श्लोक: न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे | न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ॥ 31॥ शब्दार्थ (Shabdarth): न च श्रेयः अनुपश्यामि – मुझे कोई कल्याण नहीं दिखता हत्वा – मारकर स्वजनम् – अपने

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भगवद गीता – अध्याय 1, श्लोक 30, अर्जुन का भ्रम और निर्णयशक्ति का ह्रास

भगवद गीता – अध्याय 1, श्लोक 30, अर्जुन का भ्रम और निर्णयशक्ति का ह्रास   श्लोक: न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः | निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ॥ 30॥   शब्दार्थ (Shabdarth): न च शक्नोमि – मैं नहीं कर पा रहा अवस्थातुं – स्थिर रहना भ्रमति – भ्रमित हो रहा है इव च

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भगवद गीता – अध्याय 1, श्लोक 29, अर्जुन का भय – युद्ध से पहले मन का टूटना

भगवद गीता – अध्याय 1, श्लोक 29, अर्जुन का भय – युद्ध से पहले मन का टूटना   श्लोक: वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते |  गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ॥ 29॥   शब्दार्थ (Shabdarth): वेपथु: च – कंपकंपी भी शरीरे मे – मेरे शरीर में रोम हर्ष: च जायते – रोमांच उत्पन्न हो रहा है

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भगवद गीता – अध्याय 1, श्लोक 28, अर्जुन का आत्मविचलन – धर्म संकट का आरंभ

भगवद गीता – अध्याय 1, श्लोक 28, अर्जुन का आत्मविचलन – धर्म संकट का आरंभ श्लोक: दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् |  सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥ 28॥ शब्दार्थ (Shabdarth): दृष्ट्वा – देखकर इमं स्वजनम् – इन अपने कुटुंबियों को कृष्ण – हे कृष्ण युयुत्सुम् – युद्ध के लिए उत्सुक समुपस्थितम् – सामने

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भगवद गीता – अध्याय 1, श्लोक 27, स्वजनों को देखकर अर्जुन का हृदय व्याकुल

भगवद गीता – अध्याय 1, श्लोक 27, स्वजनों को देखकर अर्जुन का हृदय व्याकुल श्लोक: तान् समीक्श्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् |  कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ॥ 27॥ शब्दार्थ (Shabdarth): तान् समीक्ष्य – उन्हें देखकर स कौन्तेयः – वह कुन्तीपुत्र (अर्जुन) सर्वान् बन्धून् – सभी संबंधियों को अवस्थितान् – युद्ध के लिए तैयार खड़ा पाया कृपया परया