हरि... हम कब मिलेंगे? (एक विरह पूर्ण पुकार)

भक्ति मार्ग में भगवान से मिलन की तड़प ही भक्त की सबसे बड़ी पूंजी है। जब हृदय से सांसारिक मोह छूटने लगता है, तब केवल एक ही प्रश्न शेष रह जाता है— “प्रभु, आप कब मिलेंगे?”

नीचे दी गई पंक्तियाँ उसी निस्वार्थ प्रेम और व्याकुलता को दर्शाती हैं:

।। भावपूर्ण भजन: हरि हम कब मिलेंगे ।।

हरि……….. हरि……….. हरि…………

हरि……….. हम कब मिलेंगे, 

आंखें…… राहें देखें तुम्हारी। 

हरि……….. हम कब मिलेंगे, 

आंखें…… राहें देखें तुम्हारी।

आओगे सांवरिया तो निहारेंगे तुम्हें, 

हरि हम कब मिलेंगे…… हरि हम कब मिलेंगे……

रोवत हैं तोरी याद में, एक दर्श को तरसे हैं हम, 

कोई न होवे है मेरो, पूछूँ कोसे— कहाँ मिलेंगे वो मुरली वाला? 

 

हरि हम कब मिलेंगे, 

हरि हम कब मिलेंगे।

 

तड़पे हैं ऐसे जैसे कोई जल बिन मछली, 

रोवत ऐसे जैसे कोई बिन माई बालक रोवे। 

प्रभु सुनो तो जरा, तुम लोग के ताने कहते हमको “तू तो है पागल”, 

 

बिन हरि हम जाए कहाँ पे, 

बिन हरि हम जाए कहाँ पे।

देखत है राह हरि की, 

हरि कब मिलेंगे, 

तोरी याद में रोवत ऐसे जैसे बिन माई बालक रोवे। 

अब तो बता दो हरि… 

हम कब मिलेंगे, 

हम कब मिलेंगे।

 

भजन का सारांश और भाव:

यह रचना एक भक्त की उस अवस्था को दर्शाती है जहाँ संसार उसे “पागल” कहने लगता है। लेकिन भक्त के लिए भगवान के बिना जीवन वैसा ही है जैसे:

  • जल बिन मछली: जिसके लिए पानी ही जीवन का आधार है।

  • बिन माँ का बालक: जो अपनी माँ के बिना पूरी तरह असहाय और व्याकुल है।